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वन पर्व
अध्याय २५४
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द्रौपद्यु उवाच
य एष चन्द्रार्कसमानतेजा; जघन्यजः पाण्डवानां प्रिय़श्च |  १७   क
वुद्ध्या समो यस्य नरो न विद्यते; वक्ता तथा सत्सु विनिश्चय़ज्ञः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति