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द्रोण पर्व
अध्याय १०२
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सञ्जय़ उवाच
लोकापवादभीरुत्वात्सोऽहं पार्थं वृकोदरम् |  १४   क
पदवीं प्रेषय़िष्यामि माधवस्य महात्मनः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति