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आदि पर्व
अध्याय २०५
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वैशम्पाय़न उवाच
स प्रवेशाय़ चाशक्तो गमनाय़ च पाण्डवः |  १२   क
तस्य चार्तस्य तैर्वाक्यैश्चोद्यमानः पुनः पुनः |  १२   ख
आक्रन्दे तत्र कौन्तेय़श्चिन्तय़ामास दुःखितः ||  १२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति