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द्रोण पर्व
अध्याय १०२
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सञ्जय़ उवाच
अतिभारे निय़ुक्तश्च मय़ा शैनेय़नन्दनः |  १६   क
स तु मित्रोपरोधेन गौरवाच्च महावलः |  १६   ख
प्रविष्टो भारतीं सेनां मकरः सागरं यथा ||  १६   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति