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द्रोण पर्व
अध्याय १०२
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सञ्जय़ उवाच
असौ हि श्रूय़ते शव्दः शूराणामनिवर्तिनाम् |  १७   क
मिथः संय़ुध्यमानानां वृष्णिवीरेण धीमता ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति