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द्रोण पर्व
अध्याय १०२
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सञ्जय़ उवाच
प्राप्तकालं सुवलवन्निश्चित्य वहुधा हि मे |  १८   क
तत्रैव पाण्डवेय़स्य भीमसेनस्य धन्विनः |  १८   ख
गमनं रोचते मह्यं यत्र यातौ महारथौ ||  १८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति