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द्रोण पर्व
अध्याय १०२
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सञ्जय़ उवाच
न चाप्यसह्यं भीमस्य विद्यते भुवि किञ्चन |  १९   क
शक्तो ह्येष रणे यत्तान्पृथिव्यां सर्वधन्विनः |  १९   ख
स्ववाहुवलमास्थाय़ प्रतिव्यूहितुमञ्जसा ||  १९   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति