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वन पर्व
अध्याय २१२
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मार्कण्डेय़ उवाच
यकृत्कृष्णाय़सं तस्य त्रिभिरेव वभुः प्रजाः |  १४   क
नखास्तस्याभ्रपटलं शिराजालानि विद्रुमम् |  १४   ख
शरीराद्विविधाश्चान्ये धातवोऽस्याभवन्नृप ||  १४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति