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आदि पर्व
अध्याय २
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सूत उवाच
ददर्श नारदं यत्र धर्मराजो युधिष्ठिरः |  २१७   क
नारदाच्चैव शुश्राव वृष्णीनां कदनं महत् ||  २१७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति