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द्रोण पर्व
अध्याय १०२
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सञ्जय़ उवाच
यथा शङ्खस्य निर्घोषः पाञ्चजन्यस्य श्रूय़ते |  ३२   क
प्रेरितो वासुदेवेन संरव्धेन यशस्विना |  ३२   ख
नूनमद्य हतः शेते तव भ्राता धनञ्जय़ः ||  ३२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति