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वन पर्व
अध्याय २९
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प्रह्लाद उवाच
अप्यस्य दारानिच्छन्ति परिभूय़ क्षमावतः |  १४   क
दाराश्चास्य प्रवर्तन्ते यथाकाममचेतसः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति