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द्रोण पर्व
अध्याय १०२
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सञ्जय़ उवाच
वर्धते हविषेवाग्निरिध्यमानः पुनः पुनः |  ३८   क
तस्य लक्ष्म न पश्यामि तेन विन्दामि कश्मलम् ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति