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द्रोण पर्व
अध्याय १०२
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सञ्जय़ उवाच
तं विद्धि पुरुषव्याघ्रं सात्वतं च महारथम् |  ३९   क
स तं महारथं पश्चादनुय़ातस्तवानुजम् |  ३९   ख
तमपश्यन्महावाहुमहं विन्दामि कश्मलम् ||  ३९   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति