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द्रोण पर्व
अध्याय १०२
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सञ्जय़ उवाच
स तत्र गच्छ कौन्तेय़ यत्र यातो धनञ्जय़ः |  ४१   क
सात्यकिश्च महावीर्यः कर्तव्यं यदि मन्यसे |  ४१   ख
वचनं मम धर्मज्ञ ज्येष्ठो भ्राता भवामि ते ||  ४१   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति