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द्रोण पर्व
अध्याय १०२
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भीमसेन उवाच
आज्ञां तु शिरसा विभ्रदेष गच्छामि मा शुचः |  ४४   क
समेत्य तान्नरव्याघ्रांस्तव दास्यामि संविदम् ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति