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द्रोण पर्व
अध्याय १०२
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सञ्जय़ उवाच
विदितं ते महावाहो यथा द्रोणो महारथः |  ४६   क
ग्रहणे धर्मराजस्य सर्वोपाय़ेन वर्तते ||  ४६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति