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वन पर्व
अध्याय २००
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मार्कण्डेय़ उवाच
भूतानामपरः कश्चिद्धिंसाय़ां सततोत्थितः |  १०   क
वञ्चनाय़ां च लोकस्य स सुखेनेह जीवति ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति