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द्रोण पर्व
अध्याय १०२
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सञ्जय़ उवाच
तं श्रुत्वा निनदं घोरं त्रैलोक्यत्रासनं महत् |  ५८   क
पुनर्भीमं महावाहुर्धर्मपुत्रोऽभ्यभाषत ||  ५८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति