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द्रोण पर्व
अध्याय १०२
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सञ्जय़ उवाच
एष वृष्णिप्रवीरेण ध्मातः सलिलजो भृशम् |  ५९   क
पृथिवीं चान्तरिक्षं च विनादय़ति शङ्खराट् ||  ५९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति