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द्रोण पर्व
अध्याय १०२
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सञ्जय़ उवाच
स भीमस्त्वरय़ा युक्तो याहि यत्र धनञ्जय़ः |  ६२   क
मुह्यन्तीव हि मे सर्वा धनञ्जय़दिदृक्षय़ा |  ६२   ख
दिशः सप्रदिशः पार्थ सात्वतस्य च कारणात् ||  ६२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति