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द्रोण पर्व
अध्याय १०२
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सञ्जय़ उवाच
गच्छ गच्छेति च पुनर्भीमसेनमभाषत |  ६३   क
भृशं स प्रहितो भ्रात्रा भ्राता भ्रातुः प्रिय़ङ्करः |  ६३   ख
आहत्य दुन्दुभिं भीमः शङ्खं प्रध्माय़ चासकृत् ||  ६३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति