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द्रोण पर्व
अध्याय १०२
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सञ्जय़ उवाच
आरुजन्विरुजन्पार्थो ज्यां विकर्षंश्च पाणिना |  ६६   क
सोऽवकर्षन्विकर्षंश्च सेनाग्रं समलोडय़त् ||  ६६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति