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द्रोण पर्व
अध्याय १०२
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सञ्जय़ उवाच
अपश्यन्सात्यकिं चापि वृष्णीनां प्रवरं रथम् |  ७   क
चिन्तय़ाभिपरीताङ्गो धर्मराजो युधिष्ठिरः |  ७   ख
नाध्यगच्छत्तदा शान्तिं तावपश्यन्नरर्षभौ ||  ७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति