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द्रोण पर्व
अध्याय १०२
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सञ्जय़ उवाच
वृन्दारकः सुहस्तश्च सुषेणो दीर्घलोचनः |  ७०   क
अभय़ो रौद्रकर्मा च सुवर्मा दुर्विमोचनः ||  ७०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति