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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४६
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व्रह्मो उवाच
न चक्षुषा न मनसा न वाचा दूषय़ेत्क्वचित् |  ४१   क
न प्रत्यक्षं परोक्षं वा किञ्चिद्दुष्टं समाचरेत् ||  ४१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति