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द्रोण पर्व
अध्याय १०२
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सञ्जय़ उवाच
ललाटेऽताडय़च्चैनं नाराचेन स्मय़न्निव |  ७८   क
ऊर्ध्वरश्मिरिवादित्यो विवभौ तत्र पाण्डवः ||  ७८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति