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द्रोण पर्व
अध्याय १०२
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सञ्जय़ उवाच
तवार्जुनो नानुमते व्रह्मवन्धो रणाजिरम् |  ८३   क
प्रविष्टः स हि दुर्धर्षः शक्रस्यापि विशेद्वलम् ||  ८३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति