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द्रोण पर्व
अध्याय १०२
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सञ्जय़ उवाच
पिता नस्त्वं गुरुर्वन्धुस्तथा पुत्रा हि ते वय़म् |  ८५   क
इति मन्यामहे सर्वे भवन्तं प्रणताः स्थिताः ||  ८५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति