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द्रोण पर्व
अध्याय १०२
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सञ्जय़ उवाच
तं पुनः परिवव्रुस्ते तव पुत्रा रथोत्तमम् |  ८९   क
अन्यं च रथमास्थाय़ द्रोणः प्रहरतां वरः ||  ८९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति