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द्रोण पर्व
अध्याय १०२
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सञ्जय़ उवाच
ततो वृन्दारकं वीरं कुरूणां कीर्तिवर्धनम् |  ९५   क
पुत्राणां तव वीराणां युध्यतामवधीत्पुनः ||  ९५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति