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द्रोण पर्व
अध्याय १०२
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सञ्जय़ उवाच
अभय़ं रौद्रकर्माणं दुर्विमोचनमेव च |  ९६   क
त्रिभिस्त्रीनवधीद्भीमः पुनरेव सुतांस्तव ||  ९६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति