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वन पर्व
अध्याय १७३
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वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तदाज्ञाय़ मतं महात्मा; तेषां स धर्मस्य सुतो वरिष्ठः |  १७   क
प्रदक्षिणं वैश्रवणाधिवासं; चकार धर्मार्थविदुत्तमौजः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति