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आदि पर्व
अध्याय १०३
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वैशम्पाय़न उवाच
अचक्षुरिति तत्रासीत्सुवलस्य विचारणा |  ११   क
कुलं ख्यातिं च वृत्तं च वुद्ध्या तु प्रसमीक्ष्य सः |  ११   ख
ददौ तां धृतराष्ट्राय़ गान्धारीं धर्मचारिणीम् ||  ११   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति