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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ९
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मरुत्त उवाच
संवर्तोऽय़ं याजय़िता द्विजो मे; वृहस्पतेरञ्जलिरेष तस्य |  १६   क
नासौ देवं याजय़ित्वा महेन्द्रं; मर्त्यं सन्तं याजय़न्नद्य शोभेत् ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति