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शान्ति पर्व
अध्याय १०३
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युधिष्ठिर उवाच
जैत्र्या वा कानि रूपाणि भवन्ति पुरुषर्षभ |  १   क
पृतनाय़ाः प्रशस्तानि तानीहेच्छामि वेदितुम् ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति