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शान्ति पर्व
अध्याय १०३
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भीष्म उवाच
तेषां सान्त्वं क्रूरमिश्रं प्रणेतव्यं पुनः पुनः |  २६   क
सम्पीड्यमाना हि परे योगमाय़ान्ति सर्वशः ||  २६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति