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शान्ति पर्व
अध्याय १०३
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भीष्म उवाच
प्रहरिष्यन्प्रिय़ं व्रूय़ात्प्रहरन्नपि भारत |  ३४   क
प्रहृत्य च कृपाय़ेत शोचन्निव रुदन्निव ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति