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भीष्म पर्व
अध्याय ३३
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श्रीभगवानु उवाच
भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन |  ५४   क
ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति