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वन पर्व
अध्याय २२२
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वैशम्पाय़न उवाच
तव वश्या हि सततं पाण्डवाः प्रिय़दर्शने |  ५   क
मुखप्रेक्षाश्च ते सर्वे तत्त्वमेतद्व्रवीहि मे ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति