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अनुशासन पर्व
अध्याय १०३
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भृगुरु उवाच
इत्युक्तः स तदा तेन सर्पो भूत्वा पपात ह |  २३   क
अदृष्टेनाथ भृगुणा भूतले भरतर्षभ ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति