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द्रोण पर्व
अध्याय २०
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सञ्जय़ उवाच
ततो राजानमासाद्य प्रहरन्तमभीतवत् |  ४१   क
अविध्यन्नवभिः क्षेमं स हतः प्रापतद्रथात् ||  ४१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति