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अनुशासन पर्व
अध्याय १०३
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भृगुरु उवाच
ततः शक्रं समानाय़्य देवानाह पितामहः |  ३१   क
वरदानान्मम सुरा नहुषो राज्यमाप्तवान् |  ३१   ख
स चागस्त्येन क्रुद्धेन भ्रंशितो भूतलं गतः ||  ३१   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति