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अनुशासन पर्व
अध्याय १०३
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भृगुरु उवाच
न च शक्यं विना राज्ञा सुरा वर्तय़ितुं क्वचित् |  ३२   क
तस्मादय़ं पुनः शक्रो देवराज्येऽभिषिच्यताम् ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति