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अनुशासन पर्व
अध्याय १०३
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भृगुरु उवाच
एवं सम्भाषमाणं तु देवाः पार्थ पितामहम् |  ३३   क
एवमस्त्विति संहृष्टाः प्रत्यूचुस्ते पितामहम् ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति