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अनुशासन पर्व
अध्याय १०३
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भृगुरु उवाच
सोऽभिषिक्तो भगवता देवराज्येन वासवः |  ३४   क
व्रह्मणा राजशार्दूल यथापूर्वं व्यरोचत ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति