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अनुशासन पर्व
अध्याय १०३
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भृगुरु उवाच
एवमेतत्पुरावृत्तं नहुषस्य व्यतिक्रमात् |  ३५   क
स च तैरेव संसिद्धो नहुषः कर्मभिः पुनः ||  ३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति