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अनुशासन पर्व
अध्याय १०३
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भृगुरु उवाच
तस्माद्दीपाः प्रदातव्याः साय़ं वै गृहमेधिभिः |  ३६   क
दिव्यं चक्षुरवाप्नोति प्रेत्य दीपप्रदाय़कः |  ३६   ख
पूर्णचन्द्रप्रतीकाशा दीपदाश्च भवन्त्युत ||  ३६   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति