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द्रोण पर्व
अध्याय १७२
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सञ्जय़ उवाच
केनेमौ मर्त्यधर्माणौ नावधीत्केशवार्जुनौ |  ४९   क
एतत्प्रव्रूहि भगवन्मय़ा पृष्टो यथातथम् ||  ४९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति