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उद्योग पर्व
अध्याय १०३
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गरुड उवाच
अवज्ञाय़ तु यत्तेऽहं भोजनाद्व्यपरोपितः |  १५   क
तेन मे गौरवं नष्टं त्वत्तश्चास्माच्च वासव ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति