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शल्य पर्व
अध्याय ५०
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वैशम्पाय़न उवाच
तत्राप्युपस्पृश्य वलो दत्त्वा दानानि चात्मवान् |  २   क
सारस्वतस्य धर्मात्मा मुनेस्तीर्थं जगाम ह ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति